हमारे शरीर की रोगप्रतिरोधक शक्ति (इम्यून सिस्टम) किसी रोगकारक से कैसे लड़ती है ??

दोस्तो हमारी इससे पहेली वाली पोस्ट में हमने जाना की हमारे शरीर की जो रोगप्रतिरोधक शक्ति है वो क्या होती है और किस तरह हमें वो कई प्रकार के रोगो से बचाती है। 

आज हम यह जानने वाले है की अगर कोई रोगकारक हमारे शरीर में प्रवेश कर लेता है तो उससे लड़ने के लिए हमारा शरीर कौन सी और कैसे प्रतिक्रिया देगा। 

चलिए इसको एक उदहारण के साथ समझते है। तो अभी जो कोरोना है वो ट्रेंडिंग में चल रहा है तो उसकी ही बात करते है।  जरा सोच कर देखिये ज्यादातर लोग कोरोना वायरस से इन्फेक्ट होने के बाद अपने आप ठीक हो जाते है । लेकिन कैसे ? .

यो यहाँ पे वायरस एक रोगकारक तो उससे लड़ने के लिए हमारे शरीर में.................

एक बड़ा युद्ध होता है बाकायदा !


वायरस यानि की रोगकारक का हमला :

हम सबको मालूम है कि वायरस ज्यादातर आपके मुँह या नाक से आपके शरीर में प्रवेश करेगा। तो वायरस आया शरीर में, 4 दिन गले में रहा, फिर आपके फेंफड़ो यानि की  लंग्स में उतर गया, लंग्स में एक कोशिका ( सेल ) के अंदर घुसा और उसके रिप्रोडक्शन ( प्रजनन ) के तरीके को इस्तेमाल करके आपने जैसे ही  जैसे बहुतसारे रोगकारक की नक़ल (copies) बना ली, फिर सारे रोगकारक मिलके अलग अलग कोशिकाओं (सेल्स) को अंदर घुसकर कोशिकाओं को ख़त्म करना शुरू कर देती है।


अब बहुत सारे वायरस हो गए हैं फेफड़ों में, मौत के करीब पहुँचने लगता है इंसान। शुरू में वायरस फेफड़ों के बाहरी कोशिकाओं (epithelial cells ) जो फेफड़ो की बाहरी दीवाल बनाते है उन कोशिकाओं को को संक्रमित (इन्फेक्ट) करता है।


वायरस अभी जंग जीत रहा होता है। 

 

शरीर के सेनापति तक खबर पहुँचती है :

हमारे शरीर का सेनापति होता है हमारा रोगप्रतिरोधक शक्ति यानि की हमारा  इम्यून सिस्टम .

 

इम्यून सिस्टम के पास सभी दुश्मनों का लेखा जोखा होता है की किसपर कौनसा अटैक करना है, और हमारा इम्यून सिस्टम एंटी-बॉडीज की एक सेना तैयार की जाती है और वायरस पर हमले के लिए भेज दी जाती है। 

 

एंटी बॉडी रूपी सेना की रचना :-

एंटीबाडी सेना की रचना किस प्रकार की होगी वो अटैक के तरीके को देखकर होती है,

अगर वो वायरस पहले अटैक कर चुका है तो उसकी एंटीबाडी रचना पहले से मेमोरी में होगी और उसे तुरत वायरस को मारने के लिए भेज दिया जाता है। 


अगर वायरस नया है जैसा की कोरोना वायरस के केस में है तो इम्यून सिस्टम हिट एंड ट्रायल से सेना की रचना करता है। यानि की वो अलग अलग किश्म के एंटीबॉडी तैयार करेगा उन सभी को बरी बरी से वायरस के साथ लड़ने भेजेगा और उनमे से जो भी एंटीबॉडी वायरस को मारने में सक्षम होगा हमारा शरीर उसके ही जैसे और एंटीबॉडी बनाके शरीर की रक्षा करेगा। 

अलग अलग एंटीबॉडी कोनसे और किस प्रकार के होंगे 

सबसे पहले भेजा जाता है हमारे शरीर के सबसे फेमस योद्धा "इम्मुनोग्लोबुलीन g (IMMUNOGLOBULIN g - IGg " को, 

ये शरीर की सबसे कॉमन एंटीबाडी है और ज्यादातर युद्धों में जीत का सेहरा इसी के बंधता है। 


इम्मुनोग्लोबुलीन  g सेना शुरूआती अटैक करती है वायरस सेना पर और उसे काबू करने की कोशिश करती है। 

इम्मुनोग्लोबुलीन g सेना को कवर फायर देती है एंटीबाडी इम्मुनोग्लोबुलीन म (IMMUNOGLOBULIN m - IGm  सेना जो अटैक की दूसरी लाइन होती है। 

 

 

युद्ध की शुरुआत 

भीषण युद्ध छिड़ता है दोनों ही पार्टियों में,

इम्मुनोग्लोबुलिन g वायरस पर टूट पड़ता है और उसे बेअसर करने की कोशिश करता है,.


जो सेल्स अभी तक ख़त्म नहीं हुए होते हैं उन्हें बचाने की कोशिश की जाती है ताकि वो सुसाइड ना कर ले, 

लेकिन वायरस क्यूंकि अभी ताकतवॉर है इसलिए वो इम्यून सेल्स को भी इन्फेक्ट करना शुरू कर देता है, जो की वायरस को अपनी जीत के तौर पर लगता है। लेकिन... 

 

इम्यून सिस्टम की दूसरी सेना

इम्मुनोग्लोबिन g और इम्मुनोग्लोबिन m के अलावा हमारा इम्यून सिस्टम एक गुरिल्ला आर्मी भी छोड़ देता है खून में,

जिसमे की तीन टाइप के प्रमुख योद्धा हैं, 


पहले हैं B सेल्स, जो जनरल सेना टाइप है, जिनके पास बहुत सारी जानकारी होती है जो उन्हें लड़ने में बहुत मदद करती है। 

दुसरे हैं हेल्पर T सेल्स Helper-T cell, जो मददगार सेल्स होते हैं, और बाकी सेल्स को हेल्प करते हैं,

तीसरे और सबसे इम्पोर्टेन्ट होते हैं किलर T सेल्स killer-T cell , जो शिवाजी तरह चुस्त योद्धा होते हैं और आत्मघाती हमला टाइप करते हैं जिस से वायरस के छक्के छूट जाते हैं। 

 

युद्ध का लम्बा खिंचना :-

जितना युद्ध लम्बा खिंचता जाता है उतनी ही मात्रा में B और दोनों टाइप के T सेल्स की मात्रा खून में बढ़ती जाती है और उतना ही खतरा बढ़ता जाता है। 

ज़िन्दगी और मौत का फर्क :

इंसानी मौत के ज्यादा चांस तब हैं जब उसका इम्युनिटी का सेनापति पहले से किसी और बीमारी से लड़ रहा हो, इसलिए उसकी सेना को दो या ज्यादा पर लड़ना होता है, और कभी कभी लड़ाई में हार भी हो जाती है। 

वायरस इम्यून सेल्स को संक्रमित यानि की इन्फेक्ट करता रहता है और उन्हें अपने जाल (ट्रैप) में फंसता रहता है, फिर इम्मुनोग्लोबिन g और इम्मुनोग्लोबिन m, खून से सप्लाई हो रही सेना से मिल के वायरस को बुरी तरह पेलना शुरू कर देती है, 


इस लड़ाई ट्रैप वगैरह में कई दिन लग जाते हैं, इसलिए बीमार और वृद्ध व्यक्ति इतना अगर झेल गया तो बच जाता है वरना फेफड़ो के बर्बाद हो जाने की वजह से मौत हो जाती है, लेकिन स्वस्थ इंसान में मौत होने की संभावना बहुत ही कम होती है हमारा इम्यून सिस्टम अपनी पूरी कोशिश करता है की वायरस को हरा दिया जाये । 

इस युद्ध के दौरान इंसान को ज्यादा से ज्यादा आराम करना चाहिए ताकि सेनापति को युद्ध के अलावा बाकी चीज़ों की टेंशन ना लेनी पड़े। 

 

इम्युनिटी सिस्टम की जीत :

जीत होते ही ये वाक़या इम्यून सिस्टम की मेमोरी के इतिहास में दर्ज़ हो जाता है, यानि की जिस वायरस ने हमला किया था उसकी सारी की सारी जानकारी मेमोरी कोशिकाओं में दर्ज हो जाती है ताकि अगली बार अगर यही वायरस शरीर में प्रवेश करे तो उसे आसानी से हराया जा सके। 

कुछ वायरस जो की ताकतवर होते हैं उनका इतिहास हमेशा के लिए लिख लिया जाता है जैसे की चिकनपॉक्स(शीतला) और पोलियो वाले का, की जब भी ये शरीर पर दुबारा हमला करे तो कैसे जल्दी से पेलना है इसको, ताकि देर ना हो जाए !


कुछ वायरस फालतू टाइप्स भी होते हैं जैसे जुकाम टाइप्स, उनको इम्यून सिस्टम मेमोरी महीना दो महीना रख के रद्दी में फेंक देती है, की फिर आएगा तो देख लेंगे दम नहीं है बन्दे में। इसीलिए इंसान को जुकाम होता रहता है साल दर साल, क्यूंकि ये सेनापति के हिसाब से छेरु वायरस है, कभी भी आसानी से ख़त्म किया जा सकता है इसे।

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